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ब्रम्हविहार

मैत्री, (मेत्ता) करुणा, मुदिता आणि उपेक्षा या चार मनोवृत्तींना ब्रह्मविहार म्हणतात.  ब्रह्मविहार म्हणजे श्रेष्ठ विहार, किंवा ब्रह्मदेव-ज्याला लोकपिता म्हणतात- जसा प्राणीमात्राविषयी अत्यंत अनुकपेने वागतो, तशा रीतीने वागणे.  यांचे विधान सुत्तपिटकात अनेक ठिकाणी आढळते, आणि ते बहुतेक एकाच पद्धतीचे आहे.  तरी प्रसंगाला अनुकूल असा हा हा अंगुत्तर निकायातील१ उतारा येथे देण्यात येत आहे.
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१ अंगुत्तरनिकाय चतुक्कनिपात (P.T.S.) भाग २, पृ. १८४.
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कथं च भिक्खवे भिक्खु ब्रह्मप्पत्तो होति ?  इध भिक्खवे भिक्खु मेत्तासहगतेन चेतसा... करुणासहगतेन चेतसा... मुदितासहगतेन चेतसा...उपेक्खासहगतेन चेतसा एक दिस फरित्वा विहरति तथा दुतियं तथा ततियं तथा चतुत्थिं, इति उद्धमधी तिरियं सब्बधि अप्पमाणेन अवेरेन अव्ध्दयापज्झेन फरित्वा विहरति ।  एवं खो भिक्खवे भिक्खु बह्मप्पत्तो होती ।

अर्थ - भिक्षुहो, एखादा भिक्षु ब्रह्मप्राप्‍त कसा होतो ?  भिक्षु मैत्रीसहगतचित्ताने... करुणासहगतचित्ताने मुदितासहगतचित्ताने उपेक्षासहगतचित्तानें एक दिशा, त्याप्रमाणे दुसरी तिसरी आणि चवथी दिशा भरून टाकतो.  याप्रमाणे वर, खाली, आजूबाजूला, सर्वत्र सर्वांचा आत्मा होऊन सर्व जग विपुल, महग्दत, अप्रमाण, अवैर, अद्वेषमय अशा उपक्षासहगतचित्ताने भरून टाकतो.  याप्रमाणे तो भिक्षु ब्रह्मप्राप्‍त होतो.

या उतार्‍यात फार जुने मैत्रीकरुणादिकांचे विधान दिले आहे.  परंतु त्यात मैत्रीला आरंभ कसा करावा हे सांगितले नाही. विभंग प्रकरणात 'सेय्यथा पि नाम एक पुग्गलं पिय मनापं दिस्वा मेत्तायेय्य, एवमेत्र सब्बे सत्ते मेत्ताय फरति.*  (जसा एखाद्या प्रिय मनुष्याला पाहून त्यावर मैत्री करतो, त्याप्रमाणे सर्व सत्त्वांवर मैत्री करावी)' असे म्हटले आहे.  म्हणजे विभंगाच्या म्हणण्याप्रमाणे एका आवडत्या मनुष्यावर मैत्रीभावनेला आरंभ करून मग ती हळूहळू सर्व प्राणिमात्रावर पसरावी असे होते.  परंतु विशुद्धिमार्गाचे विधान याहून भिन्न आहे.  त्यांत सांगितले आहे की मैत्रीला आरंभ स्वतःवरच करावा, त्यानंतर प्रियसख्यावर, नंतर मध्यस्थावर, आणि नंतर शत्रूवर मैत्रीची भावना करावी.  कोणत्याही प्रकारे सर्व प्राणिमात्राविषयी मनात आत्यंतिक आणि निस्सीम प्रेम उत्पन्न करणे हा या भावनेचा मुख्य मुद्दा आहे.  ज्याला आपणापासूनच भावनेला सुरुवात केली असता मैत्री साधणे सुलभ जाते, त्याने तसे करावे.  ज्याला प्रिय मनुष्यापासून आरंभ केला असता सुलभ जाते त्याने तसे करावे.  मात्र ज्याने नुकताच मैत्रीला आरंभ केला असेल, त्याने एकदम शत्रूवर मैत्रीची भावना करू नये.  त्याचप्रमाणे विसदृश व्यक्तीवर आणि मृतावर भावनेला आरंभ करू नये.
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*  विभंग (P.T.S.) पृष्ठ १७२.
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